Mehar Singh Chauhan

सब ख़ैरियत?

कुछ बालाएँ आती हैं 
धरती पर हो,
जंग में हो,
अब दो हाथ मार ही दो।
दो खाने के बाद

सब ख़ैरियत?

कुछ उलझने होंगी
दुनियादारी का रिवाज़ है
मोहल्ले की चिल्ल-पॉन सुननी है
कुछ आवाज़ तुम भी दे दो - शोर में थोड़ा राग घोल दो 
इतना शोर सुनने के बाद

सब ख़ैरियत?

तबियत खुदा ने इंसान की 
नाज़ुक ही बुनी है
खाँसी, सर्दी, डेंगू के लिए बनी है
वाइरल के ज़माने में
थोड़ी कमर कस लो, थोड़ा सतर्क हो लो
बुखार आने के बाद

सब ख़ैरियत?

सुना है घर की बड़ी हो !
बड़ी उम्मीदें लाद चल रही हो !
बड़े वादे कियें हैं अपने आप से !
थोड़ा आराम भी कर लो- थोड़ा मुस्कुरा लो :)
इतनी मज़दूरी के बाद :)

ख़ुदा ख़ैरियत बक्शे ।

MeharMehar is a Management Grad currently living in NOIDA. His works have a spoken quality that makes his recitations an endearing affair.

He is one of the early members of Twin City Poetry Club and the clubs’ favorite in-house Hindi Poet. Some of Mehar’s work appeared in Lakdi Ka Pul. Mehar, during one of his visits to the Poetry Club of India was asked to recite a poem, this remains one of his favorite Muse moments.

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